रविवार, 28 मई 2017

*बेसहारा-सी एक चुभन*

*बेसहारा- सी एक चुभन*





*बेसहारा सी एक चुभन*
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यूही घसीट रही है जिंदगी
जीने की चाह नही----
लेकिन मौत का ख़ौफ़
चेहरे पर दिखता क्यो नही?

क्यो चेहरे से फूटती है रश्मियां,
नये - नये धुले सूरज की तरह---
क्यों आंखों के पोर नम नही होते,
ओंस मैं भीगी पत्तियों की तरह----

क्यों उदास पलकों से झांकती है जीने की चाह,
क्यों हसीन ख्वाब बुनती हूं , परिंदों की तरह,
क्यो बिछाते नही मेरे लिए चन्दन की चिता,
क्यो मुझे अब भी रखते हो गुलाब की पंखुड़ियों की तरह,।

मैं ख़्वाब नही जो टूट के बिखर जाउंगी
मैं एक सच हूँ ! ज्वलन्त नजर आउंगी
मैं गुजरा वक्त नही जो आ न संकू ?
मैं आज हूं ! कल भी नजर आउंगी ।।
---दर्शन के दिल से @











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